आस्था का महालोक पर्व छठ :पूजन विधि एवं पौराणिक कथा
आस्था का महालोक पर्व छठ :पूजन विधि एवं पौराणिक कथा
एक ऐसी पूजा जिसमे की
पुजारी नही होता।
जिस पूजा मे उपासक व
श्रधालु जिसके लिए देवता स्वय दर्शन देते हैं।
जिसमे उदयागामी और
अस्तगामी सूर्य दोनों पूजे जाते हैं।
जिसमे घर पे बने पकवान
ही प्रसाद हैं।
जिसमे पूजा स्थल (घाट)
पे कोई ऊँच- नीच, अमीर- गरीव नही है।
जिसमे लोक गीत ही पूजा
गीत है।
जिसमे प्रसाद के रूप मे
प्रयुक्त फल धरती के अंदर से, धरती पर, छोटे पौधे से, बड़े पौधों से, बड़े पेड़ों
से, जल के अंदर से, जल के सतह पर तैयार होने वाले पाये जाते हैं।
जिस पूजा मे प्रयुक्त
सभी पूजन समाग्री प्रकृति प्रदत्त है।
जिस पूजा मे पूजन
सामग्री अछूत, गरीव, निर्धन, अमीर व सामान्य जीवन यापन करने वाले समाज के सभी वर्ग
की साहभागीता से तैयार हैं।
जिस पूजा का महत्व
गाँव, शहर, महानगर, देश व विदेश तक फैला हैं।
ये यूं ही नहीं कहा जाता कि भारत पर्वों, व्रतों, परम्पराओं और रीति-रिवाजों का देश है. दरअसल यहां शायद ही ऐसा कोई महीना बीतता हो जिसमें कोई व्रत या पर्व न पड़े. हमारे पर्वों में सबसे अलग बात ये होती है कि इन सब में हमारा उत्साह किसी न किसी आस्था से प्रेरित होता है. कारण ये कि भारत के अधिकाधिक पर्व अपने साथ किसी न किसी व्रत अथवा पूजा का संयोजन किए हुए हैं. ऐसे ही त्योहारों की कड़ी में पूर्वी भारत में सुप्रसिद्ध छठ पूजा का नाम भी प्रमुख रूप से आता है.
आयोजन की बात करें तो बिहार के पटना घाट से लेकर दिल्ली के यमुना घाट समेत और भी तमाम छोटे-बड़े घाटों पर प्रत्येक व र्ष छठ का भव्य आयोजन होता है.
समय में छठ अधिकाधिक रूप से सिर्फ बिहार तक सीमित था, पर समय के साथ मुख्यतः बिहारवासियों के भौगोलिक परिवर्तनों के कारण इस पर्व का प्रसार बिहार से सटे प्रदेशों में भी हुआ और होता गया. भौगोलिक परिवर्तनों से मुख्य आशय ये है कि बिहार की लड़कियां विवाहित होकर यूपी तथा अन्य जिन प्रदेशों व स्थानों में गईं, वहां वो अपने साथ अपनी इस सांस्कृतिक धरोहर को भी लेते गईं. उन्होंने अपनी इस परम्परा को न सिर्फ पूरी संलग्नता से कायम रखा बल्कि इसके महत्व-प्रभाव के वर्णन द्वारा और लोगों तक भी इसका प्रचार-प्रसार किया.
विविध परम्पराओं, पूजन-पद्धतियों और आस्थाओं वाले हमारे इस देश में इस तरह का सांस्कृतिक प्रसार न तो नया है और न ही विचित्र. इसी सांस्कृतिक प्रसार के जरिये ही छठ का बिहार के बाहर भी प्रसार होता गया और आज यह पर्व पूर्वी भारत में बिहार समेत यूपी, झारखंड व नेपाल के तराई क्षेत्रों तक में भी बड़े धूम-धाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है. इसके अतिरिक्त छिटपुट रूप से तो इसका आयोजन समूचे भारत में और विदेशों में भी देखने को मिलता है.
बिहार व यूपी के लोगों में इस पर्व को लेकर कितनी निष्ठा है, इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि प्रत्येक वर्ष छठ के अवसर पर दिल्ली, मुंबई आदि देश के तमाम राज्यों से बिहार व यूपी जाने वाली ट्रेनों में ऐसी भीड़ उमड़ती है कि प्रशासन को स्टेशनों पर न सिर्फ सुरक्षा के विशेष इंतजाम करने पड़ते हैं, बल्कि इन राज्यों में जाने वाली मौजूद गाड़ियों के अतिरिक्त कुछ विशेष गाड़ियाँ भी चलानी पड़ती हैं. इतने के बावजूद भी जाने वाले लोगों की भीड़ को नियंत्रित करना प्रशासन को लोहे के चने चबवा देता है.
यदि इस पर्व के नाम पर विचार करें तो स्पष्ट होता है कि इस पर्व के तिथिसूचक के अपभ्रंस या देशज रूप को ही इस पर्व की संज्ञा के रूप में अपनाया गया है. जैसे कि इसे मुख्य रूप से इसकी षष्ठी तिथी को होने वाली सूर्यदेव की अर्घ्य के लिए जाना जाता है. इस प्रकार षष्ठी तिथी के विशेष महत्व के कारण उसका अपभ्रंस छठ के रूप में हमारे सामने आता है. यूं तो इस पर्व में देवता के रूप में सूर्यदेव की ही प्रतिष्ठा है, पर तिथी के कारण ये छठ नाम से प्रसिद्ध हो गया है.
वैसे तो यह पर्व वर्ष में दो बार चैत्र और कार्तिक मास में मनाया जाता है. पर इनमें तुलनात्मक रूप से अधिक प्रसिद्धि कार्तिक मास के छठ की ही है. हिंदू कैलेण्डर के अनुसार कार्तिक मास में दीपावली बीतने के बाद इस चार दिवसीय पर्व का आगाज़ हो जाता है. कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से शुरू होकर ये पर्व कार्तिक शुक्ल सप्तमी को भोर की अर्घ्य देने के साथ समाप्त होता है. इस चार दिवसीय पर्व का आगाज़ ‘नहाय खाय’ नामक एक रस्म से होता है. इसके बाद खरना, फिर सांझ की अर्घ्य व अंततः भोर की अर्घ्य के साथ इस पर्व का समापन हो जाता है. यूं तो ये पर्व चार दिवसीय होता है, पर मुख्यतः षष्ठी और सप्तमी के अर्घ्य का ही विशेष महत्व माना जाता है.
व्रती व्यक्ति द्वारा पानी में खड़े होकर सूर्य देव को ये अर्घ्य दिए जाते हैं. इसी क्रम में उल्लेखनीय होगा कि संभवतः ये अपने आप में ऐसा पहला पर्व है जिसमे कि डूबते और उगते दोनों ही सूर्यों को अर्घ्य दिया जाता है; उनकी वंदना की जाती है. सांझ-सुबह की इन दोनों अर्घ्यों के पीछे हमारे समाज में एक आस्था काम करती है. वो आस्था ये है कि सूर्यदेव की दो पत्नियां हैं– ऊषा और प्रत्युषा. सूर्य के भोर की किरण ऊषा होती है और सांझ की प्रत्युषा, अतः सांझ-सुबह दोनों समय अर्घ्य देने का उद्देश्य सूर्य की इन दोनों पत्नियों की अर्चना-वंदना होता है.
छठ के गीत तो धुन, लय, बोल आदि सभी मायनों में एक अलग और अत्यंत मुग्धकारी वैशिष्ट्य लिए हुए होते हैं. ‘कांच ही बांस के बहन्गियां’, ‘मरबो जे सुगवा धनुष से’, ‘केलवा के पात पर’, ‘पटना के घाट पर’ आदि इस पर्व के कुछ सुप्रसिद्ध गीत हैं, जिन्हें तमाम बड़े-छोटे गायकों द्वारा गाया भी जा चुका है. इन गीतों का लय और संगीत इतना अलग और मुग्धकारी होता है कि इनको सुनते वक़्त अनायास आपको छठ के वातावरण का आभास होने लगता हैं. आलम यह कि जिसका वास्ता छठ से न हो, वह भी अगर इन गीतों को सुने और समझ सके तो इनके आकर्षण से नहीं बच सकता. केला, सेब, अन्नानस, आदि अनेक फलों के अतिरिक्त गन्ना और घर में बने ठेकुआ आदि चीजें इसके प्रसाद को भी विविधतापूर्ण और विशेष बनाती हैं.
इस पर्व का प्रभाव भारतीय राजनीति में भी व्यापक रूप से देखने को मिलता है. अब यूपी-बिहार तो खैर इस पर्व के गढ़ ही हैं, तो वहां तो नेताओं द्वारा इसके लिए घाटों पर साफ-सफाई और सुरक्षा आदि की चाक-चौबंद व्यवस्था की ही जाती है, साथ ही राजधानी दिल्ली, महाराष्ट्र जैसे तमाम राज्यों जहां यूपी-बिहार के लोगों की बड़ी संख्या में मौजूदगी है, में भी सरकारें छठ के पूरी तैयारी करती हैं. बिहार में तो अक्सर मुख्यमंत्री खुद ही सपरिवार छठ घाट पहुंचकर पूजन-अर्घ्य आदि करते हैं. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव के यहां होने वाला छठ का भारी भरकम आयोजन तो खैर देश भर में ही प्रसिद्ध है.
मोटे तौर पर जनसामान्य की मान्यता है कि ये सिर्फ स्त्रियों का पर्व है और काफी हद तक ये मान्यता सही भी है. पर इसके साथ ही ये भी एक सत्य है कि पुरुष के बिना इस पर्व की कई रस्मे अधूरी ही रह जाएंगी. उदाहरणार्थ इस पर्व की एक अत्यंत महत्वपूर्ण रस्म जिसमे कि घर के पुरुष द्वारा पूजन सामग्री का डाल सिर पर उठाकर छठ के घाट तक ले जाया जाता है. पुरुष के होने की स्थिति में ये रस्म पुरुष द्वारा ही किया जाना आवश्यक और उचित माना गया है. लिहाजा इसे सिर्फ स्त्रियों का पर्व कहना किसी लिहाज से सही नहीं लगता.
भारत के अधिकाधिक पर्वो की एक विशेषता ये भी है कि वो किसी न किसी पौराणिक मान्यता से प्रभावित होते हैं. छठ के विषय में भी ऐसा ही है. इसके विषय में पौराणिक मान्यताएं तो ऐसी हैं कि अब से काफी पहले रामायण अथवा महाभारत काल में ही छठ पूजा का आरम्भ हो चुका था. कोई कहता है कि सीता ने तो कोई कहता है कि कुंती या द्रोपदी ने सर्वप्रथम ये छठ व्रत और पूजा की थी. एक मान्यता यह भी है कि सर्वप्रथम महाभारत कालीन सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य का पूजन किया था, जिसके बाद यह परम्परा चल पड़ी. अब जो भी हो, पर इतना अवश्य है कि अगर आपको भारतीय शृंगार, परम्परा, शालीनता, सद्भाव, और आस्था समेत सांस्कृतिक समन्वय की छटा एकसाथ देखनी हो तो अर्घ्य के दिन किसी छठ घाट पर चले जाइए. आप वो देखेंगे जो आपके मन को प्रफुल्लित कर देगा.
छठ पूजा के दिन
पहला दिन-
नहाय खाय
दूसरा दिन-
खरना
तीसरा दिन-
अस्तचलगामी सूर्य को अर्घ्य
चौथे दिन यानी आखिरी दिन-
उदीयमान सूर्य को अर्घ्य
चार दिनों तक छठ पूजा के नियम
नहाय-खाय के साथ छठ पर्व शुरू (पहला दिन)
नहाय-खाय के साथ लोक आस्ठा के महापर्व की शुरुआत हो जाएगी. ये चार दिनों का अनुष्ठान नहाय खाय के साथ शुरू होता है. पहले दिन व्रती नदी जलाशय में स्नान के बाद पूरी शुद्धता रखते हुए कद्दू भात का प्रसाद तैयार करते हैं. शुद्धता के लिए मिट्टी का चूल्हा और जलाव के तौर पर आम की लकड़ी उपयोग में लायी जाती है. और फिर आरवा चावल का भात, चने की दाल और कद्दू (लौकी) की सब्जी बनायी जाती है. स्नान के बाद व्रती यही भोजन ग्रहण करते हैं और इसे छठ पर्व का पहला प्रसाद भी कहा जाता है.
36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू (दूसरा दिन)
छठ का दूसरा दिन - लोकआस्था के पर्व के दूसरे दिन को खरना कहते हैं. इस दिन व्रती दिनभर उपवास करते हैं और फिर देर शाम गुड़ और चावल की खीर बनायी जाती है. दिनभर के उपवास के बाद वर्ती खीर का प्रसाद ग्रहण करते हैं. जिसे हम खरना के नाम से जानते हैं. और खरना के बाद से ही शुरू होता है छठ व्रतियों का 36 घंटे का निर्जला उपवास. जो उदयीमान सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही संपन्न होता है.
सूर्य देव को पहला अर्घ्य (तीसरा दिन)
छठ पूजा का तीसरा दिन - महापर्व छठ के तीसरे दिन. भगवान भाष्कर को पहला अर्घ्य दिया जाता है. और ये एकमात्र ऐसी पूजा है जिसमें अस्ताचलगामी यानी डूबते सूर्य की पूजा की जाती है. दिनभर उपवास के बाद व्रती शाम में नदी, जलाशयों में खड़े होकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देते हैं. छठ घाटों पर बांस का डाला और प्रसाद से सजे सूप बड़े ही मनमोहक नजर आते हैं. ये दृश्य बड़ा ही मनोरम लगता है. छठ के गीत और व्रतियों की आभा से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है.
सूर्य देव को दूसरा अर्घ्य (आखिरी दिन)
छठ पर्व का चौथा दिन- शाम को छठ घाट से लौटन के बाद व्रती सूर्योदय का इंतजार करते हैं. अगली सुबह उदयीमान सूर्य को अर्घ्य देने के बाद लोकआस्था के महापर्व का समापन होता है. भगवान भाष्कर, छठी मैया से मनोकामना पूरी करने की आस लिए श्रद्धालु ये व्रत करते हैं जिसमें 36 घंटे का निर्जला उपवास होता है. और ये छठ मां की ही महिमा है कि जो भी इस पर्व को पूरी श्रद्धा के साथ करते हैं उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. ये पर्व ये भी संदेश देता है कि प्रकृति से ही जीवन संभव है.
महापर्व छठ की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, प्रियव्रत नाम के एक राजा हुआ करते थे. उनकी पत्नी मालिनी थी. दोनों की कोई संतान नहीं थी. इसे लेकर वे दोनों बहुत दुखी रहते थे. एक दिन उन्होंने संतान प्राप्ति की इच्छा जाहिर करते हुए महर्षि कश्यप से पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया. इसके बाद उनकी पत्नी मालिनी गर्भवती हुई. नौ महीने बाद जब उन्हें संतान सुख प्राप्त करने का समय आया, उनकी पत्नी से मरा हुआ पुत्र का जन्म हुआ. मरे हुए पुत्र के जन्म से राजा को इतना दुख हुआ कि उसने आत्महत्या करने का अपना मन बना लिया. कथा के अनुसार, राजा ने जैसे ही आत्महत्या करने की कोशिश की उसी वक्त उनके सामने एक देवी प्रकट हुई. देवी ने राजा से कहा कि मैं षष्टी देवी हूं. मैं लोगों को पुत्र का सौभाग्य प्रदान करती हूं. इसके अलावा जो सच्चे भाव से मेरी पूजा करता है, मैं उसके सभी प्रकार के मनोरथ को पूरा कर देती हूं. यदि तुम मेरी पूजा करोगे तो मैं तुम्हें पुत्र रत्न प्रदान करूंगी. देवी की बातों से प्रभावित होकर राजा ने उनकी आज्ञा का पालन किया. राजा और उनकी पत्नी ने कार्तिक शुक्ल की षष्टी तिथि के दिन देवी षष्टी की पूरे विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की. इस पूजा के फलस्वरूप उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई. कहा जाता है तभी से छठ के इस पावन पर्व को मनाने की प्रथा है.
इसके अलावे एक और कथा है जिसमें कहा जाता है कि जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा. इस व्रत के प्रभाव से उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं. साथ ही पांडवों को राजपाट वापस मिला था.
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